Open Letter to the Prime Minister India–USA Trade Agreement and the Future of Farmers

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Author : Arun Ramchandra Pangarkar Founder : Shramik Kranti Mission – Voice of the Poor Open Letter to the Prime Minister India–USA Trade Agreement and the Future of Farmers This letter has been formally submitted on the Government of India’s PG Portal. Registration Number : PMOPG/E/2026/0022461 Subject: Concern regarding the interests of farmers and workers in the context of the India–USA Trade Agreement To, Hon’ble Prime Minister of India, Respectful greetings. As a conscious Indian citizen, I wish to place before you my serious concern regarding the future of farmers, workers, and the poor in the context of the India–USA trade agreement. Netaji Subhas Chandra Bose had clearly stated that political freedom remains incomplete unless the nation becomes economically self-reliant. Similarly, Dr. Babasaheb Ambedkar warned that no democracy can survive withou...

जैविक खेती = स्वस्थ जीवन

Shramik Kranti – Garibon Ka Aawaz

रासायनिक खादों से मुक्ति : जैविक खेती की पहली लड़ाई

जैविक खेती = स्वस्थ जीवन

— अनुभव से समझ में आई सच्चाई

आज जब हम “स्वास्थ्य” की बात करते हैं, तो हमारे सामने गोलियाँ, दवाइयाँ, जाँच रिपोर्ट और अस्पताल दिखाई देते हैं। लेकिन असली प्रश्न यह है — हम बीमार क्यों पड़ रहे हैं?

जब मैंने यह प्रश्न स्वयं से पूछना शुरू किया, तो समझ में आया कि समस्या केवल शरीर में नहीं, बल्कि उसकी शुरुआत सीधे खेती से होती है।

रासायनिक खेती : उत्पादन बढ़ा, लेकिन जीवन?

हरित क्रांति के बाद यूरिया, डीएपी, कीटनाशक और खरपतवार नाशकों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया। उत्पादन बढ़ा, भोजन सस्ता हुआ — लेकिन इसकी कीमत हमने अपने स्वास्थ्य से चुकाई।

  • मिट्टी धीरे-धीरे मृत होती चली गई
  • फसलों की प्राकृतिक रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई
  • कीट और रोग बढ़े, साथ ही खेती का खर्च भी बढ़ा
  • मनुष्य धीरे-धीरे स्थायी रोगी बनता चला गया

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विकसित हुई नाइट्रोजन-आधारित रासायनिक उद्योग क्षमता को खेती में उपयोग किया गया। शुरुआत में उत्पादन बढ़ा, लेकिन समय के साथ मिट्टी का जैविक कार्बन, सूक्ष्मजीव और प्राकृतिक संतुलन नष्ट होने लगा। आज प्रश्न केवल उत्पादन का नहीं, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य का बन चुका है।

प्रश्न उठने लगे…

मैंने स्वयं देखा कि टूथपेस्ट उपयोग करने वालों के भी दाँत खराब होते हैं, रसायनयुक्त भोजन खाने वालों की पाचन शक्ति बिगड़ती है, और फ्रिज में लंबे समय तक रखा भोजन शरीर को अनुकूल नहीं होता।

इसी दौरान मुझे आदरणीय राजीवजी दीक्षित के विचार सुनने का अवसर मिला। उनका एक प्रश्न मन में गहराई से बैठ गया:

यदि हमें स्वस्थ मनुष्य चाहिए, तो क्या हमारा भोजन स्वस्थ नहीं होना चाहिए?

जैविक खेती क्या है?

जैविक खेती केवल रासायनिक खादों से परहेज़ करना नहीं है। जैविक खेती का मूल उद्देश्य है — मिट्टी को जीवित रखना। रासायनिक खादों की गिरफ्त से भूमि को मुक्त किए बिना सच्ची जैविक खेती संभव नहीं है।

जैविक खेती की श्रृंखला

जीवित मिट्टी → स्वस्थ फसल → शुद्ध भोजन → स्वस्थ मनुष्य

खरपतवार और कीट : शत्रु नहीं, संकेत हैं

हम आमतौर पर खरपतवार और कीटों को खेती का दुश्मन मानते हैं। लेकिन प्रकृति की दृष्टि से ये मिट्टी और फसलों की स्थिति के संकेत होते हैं। जहाँ मिट्टी कमजोर, असंतुलित या अत्यधिक रसायनों से प्रभावित होती है, वहीं खरपतवार और कीट अधिक दिखाई देते हैं।

खरपतवार मिट्टी की संरचना, नमी, जैविक पदार्थ और सूक्ष्मजीवों की स्थिति बताते हैं। कुछ खरपतवार मिट्टी को ढककर नमी बनाए रखते हैं, कटाव रोकते हैं और जैविक पदार्थ बढ़ाते हैं। इसलिए जैविक खेती में खरपतवार प्रबंधन आवश्यक है, न कि उनका पूर्ण उन्मूलन।

इसी प्रकार कीटों का बढ़ना फसल की कमजोर प्रतिरोधक क्षमता का संकेत है। रासायनिक खादें फसल को तेजी से बढ़ाती हैं, लेकिन उनकी प्राकृतिक रोग-प्रतिरोधक शक्ति घटा देती हैं। इसलिए कीट आकर्षित होते हैं। कीटों को मारने के बजाय फसल को मजबूत बनाना अधिक टिकाऊ उपाय है।

प्रकृति में कोई भी वस्तु व्यर्थ नहीं होती। खरपतवार, कीट और रोग प्रकृति के शत्रु नहीं, बल्कि मानव हस्तक्षेप से बिगड़े संतुलन की चेतावनी हैं। इन संकेतों को समझ लिया जाए, तो खेती अधिक स्वस्थ, टिकाऊ और कम खर्चीली बन सकती है।

दैनिक जीवन में महसूस हुए परिवर्तन

जैसे-जैसे भोजन के प्रति सोच बदली, वैसे-वैसे जीवन में परिवर्तन दिखाई देने लगे। ताज़ा और सरल भोजन शरीर को अनुकूल लगने लगा। पाचन सुधरा और दवाइयों पर निर्भरता कम हुई।

आदतों में किए गए सचेत बदलावों से परिणाम मिले। फिटकरी के पानी से कुल्ला करने से दाँतों की समस्याएँ कम हुईं। दूध या छाछ से कुल्ला करने पर मुँह स्वच्छ महसूस होने लगा। प्रेशर कुकर और फ्रिज के अत्यधिक उपयोग से बचने पर पाचन बेहतर हुआ। ये परिवर्तन एक दिन में नहीं हुए, लेकिन जागरूक प्रयासों से अंतर स्पष्ट दिखा।

क्या 100% जैविक खेती तुरंत संभव है?

ईमानदार उत्तर — नहीं। लेकिन धीरे-धीरे, योजनाबद्ध तरीके से परिवर्तन निश्चित रूप से संभव है।

  • 1–2 एकड़ में जैविक खेती की शुरुआत
  • रासायनिक खादों की मात्रा धीरे-धीरे कम करना
  • गोबर खाद, फसल अवशेष, कंपोस्ट और जीवामृत का उपयोग

जैविक खेती : एक जीवनशैली

जैविक खेती केवल खेती की पद्धति नहीं है। यह किसान, उपभोक्ता और प्रकृति को जोड़ने वाली जीवनशैली है। खरपतवार मिट्टी का प्रकार बताते हैं। कीट तब बढ़ते हैं जब फसल कमजोर होती है। अत्यधिक नाइट्रोजन फसल को कोमल और कमजोर बनाती है। इसलिए कीट समस्या नहीं, बल्कि चेतावनी हैं।

निष्कर्ष

जैविक खेती = स्वस्थ जीवन

यह कोई नारा नहीं, बल्कि अनुभव से समझ में आई सच्चाई है। यदि हमें स्वस्थ पीढ़ी चाहिए, तो परिवर्तन की शुरुआत खेती से करनी होगी।

✍️ लेखक : अरुण पांगारकर
श्रमिक क्रांति – गरीबों की आवाज

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