Open Letter to the Prime Minister India–USA Trade Agreement and the Future of Farmers

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Author : Arun Ramchandra Pangarkar Founder : Shramik Kranti Mission – Voice of the Poor Open Letter to the Prime Minister India–USA Trade Agreement and the Future of Farmers This letter has been formally submitted on the Government of India’s PG Portal. Registration Number : PMOPG/E/2026/0022461 Subject: Concern regarding the interests of farmers and workers in the context of the India–USA Trade Agreement To, Hon’ble Prime Minister of India, Respectful greetings. As a conscious Indian citizen, I wish to place before you my serious concern regarding the future of farmers, workers, and the poor in the context of the India–USA trade agreement. Netaji Subhas Chandra Bose had clearly stated that political freedom remains incomplete unless the nation becomes economically self-reliant. Similarly, Dr. Babasaheb Ambedkar warned that no democracy can survive withou...

भारत–अमेरिका व्यापार समझौता : नेताजी सुभाष चंद्र बोस और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों के आलोक में

Shramik Kranti – Garibon Ka Aawaz

भारत–अमेरिका व्यापार समझौता :
नेताजी सुभाष चंद्र बोस और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों के आलोक में

प्रस्तावना

आज भारत–अमेरिका व्यापार समझौतों को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। विदेशी निवेश, निर्यात वृद्धि और आर्थिक विकास जैसे आकर्षक शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है। लेकिन इन चमकदार घोषणाओं के पीछे एक गंभीर सवाल छिपा है — क्या इन समझौतों में भारतीय किसान, श्रमिक और गरीब जनता के हित सुरक्षित हैं?

इस प्रश्न का उत्तर हमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों के संदर्भ में खोजने की आवश्यकता है।


नेताजी सुभाष चंद्र बोस : आर्थिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी

नेताजी का स्पष्ट मत था —

“राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है, जब राष्ट्र आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो।”

नेताजी ने केवल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष नहीं किया, बल्कि विदेशी आर्थिक शोषण का भी तीव्र विरोध किया। वे भली-भांति जानते थे कि यदि राजनीतिक आज़ादी के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था विदेशी शक्तियों और कंपनियों के हाथों में चली गई, तो स्वतंत्रता केवल नाम मात्र की रह जाएगी।

भारत–अमेरिका व्यापार समझौतों के संदर्भ में यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है। अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, भारी सरकारी सब्सिडी वाली कृषि व्यवस्था और अत्याधुनिक तकनीक के साथ प्रतिस्पर्धा करना भारत के छोटे और सीमांत किसानों के लिए लगभग असंभव है।

यदि नेताजी आज होते, तो वे अवश्य पूछते —

  • क्या यह समझौता भारत को आत्मनिर्भर बनाता है या परनिर्भर?
  • क्या इससे भारतीय किसान सशक्त होता है या कॉर्पोरेट कंपनियों पर निर्भर बनता है?

यदि इन समझौतों के कारण भारतीय कृषि, बीज, पानी, बाजार और मूल्य निर्धारण पर विदेशी नियंत्रण बढ़ता है, तो यह नेताजी की आर्थिक राष्ट्रवाद की अवधारणा के विपरीत होगा।


डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर : सामाजिक न्याय के बिना आर्थिक नीतियाँ खतरनाक

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने हमेशा सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता पर जोर दिया। उनका प्रसिद्ध कथन है —

“राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता, जब तक उसके आधार में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र न हो।”

बाबासाहेब भली-भांति जानते थे कि मुक्त बाजार (Free Market) सभी को समान अवसर नहीं देता। जिनके पास पूँजी, सत्ता और जानकारी होती है, वही इसका अधिक लाभ उठाते हैं। इसलिए उन्होंने कमज़ोर वर्गों की रक्षा के लिए राज्य के हस्तक्षेप की आवश्यकता पर बल दिया।

यदि भारत–अमेरिका व्यापार समझौतों के परिणामस्वरूप —

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) कमजोर होता है,
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) खतरे में पड़ती है,
  • कृषि मूल्य पूरी तरह बाजार के हवाले कर दिए जाते हैं,

तो इसका सबसे अधिक नुकसान छोटे किसानों, भूमिहीन मजदूरों और गरीब उपभोक्ताओं को होगा। बाबासाहेब की दृष्टि में यह गंभीर अन्याय है।


कृषि : केवल व्यापार नहीं, बल्कि जीवन का आधार

नेताजी और बाबासाहेब दोनों ही कृषि को केवल एक व्यापारिक गतिविधि नहीं मानते थे। उनके लिए कृषि का अर्थ था —

  • खाद्य सुरक्षा
  • ग्रामीण रोजगार
  • सामाजिक स्थिरता

यदि विदेशी व्यापार समझौतों के तहत कृषि को केवल लाभ–हानि के गणित तक सीमित कर दिया गया, तो देश की खाद्य सुरक्षा और सामाजिक शांति दोनों खतरे में पड़ सकती हैं।


निष्कर्ष : विकास किसके लिए?

आज प्रश्न यह नहीं है कि भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार करना चाहिए या नहीं। असली प्रश्न यह है —

“यह व्यापार किसके लाभ के लिए और किसकी कीमत पर?”

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आत्मनिर्भर राष्ट्र की कल्पना और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के आधार पर देखें, तो वर्तमान स्वरूप में भारत–अमेरिका व्यापार समझौते भारतीय किसानों और गरीबों के हित में नहीं दिखते

जब तक —

  • किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी जाती,
  • MSP, PDS और स्थानीय बाजारों की पूर्ण सुरक्षा नहीं की जाती,
  • और नीति निर्माण में किसान–श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती,

तब तक ऐसे समझौते देश के मूलभूत हितों को नुकसान पहुँचा सकते हैं।


स्वतंत्रता केवल झंडे तक सीमित नहीं, बल्कि पेट और सम्मान तक पहुँचनी चाहिए।

लेखक : अरुण रामचंद्र पांगारकर, प्रणेता : ✊ श्रमिक क्रांति – गरीबों की आवाज

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