लोकतंत्र की विफलता या नागरिकों की उदासीनता?

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  ✊ श्रमिक क्रांति – गरीबों की आवाज ✊ लोकतंत्र की विफलता या नागरिकों की उदासीनता? "मैं और मेरा परिवार" से "मेरा समाज, मेरा देश" तक... भारत को स्वतंत्र हुए कई दशक बीत चुके हैं। हम स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने पर गर्व करते हैं। चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं, नई योजनाएँ घोषित होती हैं। फिर भी एक प्रश्न बार-बार सामने आता है— आम नागरिकों की अनेक मूलभूत समस्याएँ वर्षों से जस की तस क्यों बनी हुई हैं? इसका उत्तर केवल सरकार, प्रशासन या राजनेताओं में ढूँढना पर्याप्त नहीं है। शायद अब समय आ गया है कि हम स्वयं का भी आत्ममंथन करें। विचार करने योग्य प्रश्न आज समाज का एक बड़ा वर्ग "मैं और मेरा परिवार" की सीमित सोच तक सिमट गया है। जब व्यक्तिगत समस्याएँ हल हो जाती हैं, तब समाज में हो रहे अन्याय, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी और सार्वजनिक समस्या...

उद्योगपति बनाम किसान और श्रमिक : असमानता की सच्चाई

उद्योगपति बनाम किसान और श्रमिक : असमानता की सच्चाई

उद्योगपति के उत्पाद को हमेशा हमी भाव मिलता है। इसलिए वे अमीर बनते हैं और अमीरी की वजह से समाज में उन्हें प्रतिष्ठा मिलती है। उन्हें कर्तृत्ववान माना जाता है और इसमें कोई संदेह नहीं कि वे कर्तृत्ववान हैं।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि वे अमीर बनते हैं तो वह श्रमिकों की मेहनत और किसानों की उपज पर ही। केवल पूंजी लगाकर और मुनाफा कमाकर अमीर बनना जितना आसान है, उतना ही कठिन है दिन-रात पसीना बहाकर असली उत्पाद तैयार करना।

फिर भी विडंबना यह है कि मेहनत करने वाले श्रमिकों को उनके पसीने का उचित दाम नहीं मिलता और वे गरीब ही रहते हैं। गरीब होने के कारण उन्हें न तो समाज में प्रतिष्ठा मिलती है और न ही कर्तृत्ववान माना जाता है।

सच्चाई यह है कि देश उद्योगपतियों के लगाए गए पूंजी से नहीं, बल्कि श्रमिकों और किसानों के पसीने से चलता है। अगर कोई इंसान दिन-रात मेहनत करके भी गरीब ही रह जाए, तो दोष उस इंसान का नहीं बल्कि व्यवस्था का है।

यही हाल किसानों का है। वे सबके लिए भोजन उगाते हैं। लेकिन उनके अन्न को हमी भाव नहीं मिलता। इसलिए वे भी गरीब ही रह जाते हैं और उन्हें भी समाज में कोई विशेष प्रतिष्ठा नहीं मिलती।

अक्सर कहा जाता है कि किसान और श्रमिक कम पढ़े-लिखे हैं। लेकिन असली शिक्षा केवल स्कूल-कॉलेज की डिग्री नहीं होती। खेती का ज्ञान भी शिक्षा है, उत्पादन का अनुभव भी शिक्षा है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसे प्रमाणपत्र नहीं मिलता।

देश की गरीबी का मूल कारण यही है— श्रमिकों और किसानों की शारीरिक और बौद्धिक मेहनत का उचित सम्मान और उचित दाम न देना। जब तक अर्थ वितरण प्रणाली में सुधार नहीं होगा, तब तक गरीबी हटाना संभव नहीं है।

✍️ लेखक : अरुण पांगारकर
आदर्श अर्थ वितरण प्रणाली आंदोलन तथा गरीबी हटाओ आंदोलन

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