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विवाह हा संस्कार की सोहळा?

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  विवाह हा संस्कार की सोहळा? भारतीय संस्कृतीत विवाह हा केवळ दोन व्यक्तींचा संबंध नाही. तो एक संस्कार मानला गेला आहे — जीवनातील एक पवित्र टप्पा. पण आजच्या काळात प्रश्न उभा राहतो: विवाह हा अजूनही संस्कार आहे का, की तो केवळ दिखावटी सोहळा बनला आहे? विवाहाचा मूळ अर्थ “संस्कार” म्हणजे व्यक्तिमत्त्व घडवणारी प्रक्रिया. विवाहाचा उद्देश होता: कुटुंब संस्था निर्माण करणे सामाजिक जबाबदारी स्वीकारणे परस्पर सन्मान आणि सहजीवन मूल्यांवर आधारित जीवनाची सुरुवात त्यात साधेपणा, कुटुंबीयांचे आशीर्वाद आणि सामाजिक साक्षीदार यांनाच महत्त्व होते. आधुनिक विवाह — वैभवाचा उत्सव आज विवाहाचे स्वरूप बदलले आहे: लाखो रुपयांचे लॉन्स थीम डेकोरेशन प्री-वेडिंग शूट डेस्टिनेशन वेडिंग शेकडो पदार्थांचे भोजन लग्न म्हणजे आता सोशल मीडिया इव्हेंट झाला आहे. या सर्व खर्चात संस्कार किती आणि प्रदर्शन किती — हा विचार करणे आवश्यक आहे. प्रतिष्ठेची स्पर्धा अनेक कुटुंबांमध्ये लग्न म्हणजे प्रतिष्ठेची लढाई बनली आहे. “लोक काय म्हणतील?” या मानसिकतेमुळे: कर्ज काढले जा...

विषैला भोजन, बढ़ता कैंसर और रासायनिक खेती : यह केवल गलती नहीं, बल्कि अपराध है

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  विषैला भोजन, बढ़ता कैंसर  और रासायनिक खेती : यह  केवल गलती नहीं, बल्कि  अपराध है आज कैंसर के मामलों में जो तेज़ी से वृद्धि हो रही है, वह केवल संयोग नहीं है और न ही केवल जीवनशैली का परिणाम है। यह लंबे समय से शरीर में जमा होते आ रहे विष का परिणाम है — और आज उस विष का सबसे बड़ा स्रोत हमारा भोजन बन चुका है। अज्ञान नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया स्वार्थ आज खेती में यूरिया, रासायनिक खाद, कीटनाशक और खरपतवारनाशक का उपयोग अज्ञानता के कारण नहीं किया जाता। कितनी मात्रा उपयोग करनी है, छिड़काव का अंतराल क्या होना चाहिए, कटाई से पहले कितने दिन रुकना चाहिए — यह सब जानकारी होने के बावजूद लाभ और बाज़ार की होड़ में अत्यधिक उपयोग किया जाता है। समाज, राष्ट्र, देशवासी, मानवता — भोजन उत्पादन के समय इन मूल्यों का विचार शायद ही किया जाता है। यह कड़वा सत्य हमें स्वीकार करना होगा। “चायना सब्ज़ी” : व्यवस्था का भयावह उदाहरण आज बाज़ार में बड़े पैमाने पर मिलने वाली तथाकथित “चायना सब्ज़ी” इस समस्या का चरम उदाहरण है। अत्यधिक तेज़ वृद्धि, अस्वाभाविक आकार, प्राक...

Poisoned Food, Rising Cancer and Chemical Farming: This Is Not Just a Mistake, It Is a Crime

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Poisoned Food, Rising Cancer and Chemical Farming: This Is Not Just a Mistake, It Is a Crime The rapid rise in cancer cases today is not a coincidence, nor merely the result of lifestyle changes. It is the consequence of toxins that have accumulated in the human body over time — and today, the biggest source of those toxins has become our food. Not Ignorance, But Deliberate Greed The use of urea, chemical fertilizers, pesticides, and herbicides in modern farming is not done out of ignorance. Farmers and producers are aware of the recommended dosage, spraying intervals, and the mandatory waiting period before harvest. Yet, excessive use continues — driven by profit and market competition. Society, nation, fellow citizens, humanity — these values rarely influence food production today. This uncomfortable truth must be acknowledged. “China Vegetables”: A Disturbing Example of the System The so-called “China vegetables” widely available in markets today...

विषारी अन्न, वाढता कॅन्सर आणि रासायनिक शेती : ही केवळ चूक नाही, तर अपराध आहे

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विषारी अन्न, वाढता कॅन्सर आणि रासायनिक शेती : ही केवळ चूक नाही, तर अपराध आहे विषारी अन्न, वाढता कॅन्सर आणि रासायनिक शेती : ही केवळ चूक नाही, तर अपराध आहे हल्ली कॅन्सरचे प्रमाण झपाट्याने वाढत आहेत. ही वाढ फक्त योगायोग नाही, ना केवळ जीवनशैलीचा परिणाम आहे. हा दीर्घकाळ शरीरात साठत गेलेल्या विषाचा परिणाम आहे, आणि त्या विषाचा सर्वात मोठा स्रोत आज अन्न बनले आहे. अज्ञान नव्हे, जाणीवपूर्वक केलेला स्वार्थ आज शेतीमध्ये युरिया, रासायनिक खते, कीटकनाशके आणि तणनाशके अज्ञानातून वापरली जात नाहीत. प्रमाण किती असावे, फवारणीचा कालावधी काय असावा, काढणीपूर्वी किती दिवस थांबावे — हे सर्व माहिती असूनही पैशाच्या हव्यासापोटी अतिरेकी वापर केला जातो. समाज, देश, देशबांधव, मानवता — अन्न पिकवताना या मूल्यांशी कोणालाही देणेघेणे उरलेले नाही, हे वास्तव स्वीकारावे लागेल. चायना भाजीपाला : प्रणालीचे भयावह उदाहरण हल्ली बाजारात मोठ्या प्रमाणावर मिळणारा तथाकथित “चायना भाजीपाला” हा या संपूर्ण समस्येचे टोकाचे उदाहरण आहे. अतिजलद वाढ, अस्वाभाविक आकार, ...

Open Letter to the Prime Minister India–USA Trade Agreement and the Future of Farmers

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Author : Arun Ramchandra Pangarkar Founder : Shramik Kranti Mission – Voice of the Poor Open Letter to the Prime Minister India–USA Trade Agreement and the Future of Farmers This letter has been formally submitted on the Government of India’s PG Portal. Registration Number : PMOPG/E/2026/0022461 Subject: Concern regarding the interests of farmers and workers in the context of the India–USA Trade Agreement To, Hon’ble Prime Minister of India, Respectful greetings. As a conscious Indian citizen, I wish to place before you my serious concern regarding the future of farmers, workers, and the poor in the context of the India–USA trade agreement. Netaji Subhas Chandra Bose had clearly stated that political freedom remains incomplete unless the nation becomes economically self-reliant. Similarly, Dr. Babasaheb Ambedkar warned that no democracy can survive withou...

प्रधानमंत्री को खुला पत्र : भारत–अमेरिका व्यापार समझौता और किसानों का भविष्य

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प्रधानमंत्री को खुला पत्र: भारत–अमेरिका व्यापार समझौता और किसानों का भविष्य प्रधानमंत्री को खुला पत्र : भारत–अमेरिका व्यापार समझौता और किसानों का भविष्य यह पत्र भारत सरकार के PG पोर्टल पर औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया गया है। पंजीकरण संख्या : PMOPG/E/2026/0022461 विषय:भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के संदर्भ में किसानों और श्रमिकों के हितों पर चिंता सेवा में, माननीय प्रधानमंत्री जी, सादर प्रणाम। मैं एक जागरूक भारतीय नागरिक होने के नाते भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के संदर्भ में किसानों, श्रमिकों और गरीब जनता के भविष्य को लेकर अपनी गंभीर चिंता आपके समक्ष रखना चाहता हूँ। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्पष्ट कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक राष्ट्र आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न हो। वहीं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने यह चेतावनी दी थी कि सामाजिक और आर्थिक न्याय के बिना कोई भी लोकतंत्र स्थायी नहीं रह सकता। आज यह आशंका गहराती जा रही है कि भारत–अमेरिका जैसे व्यापार समझौतों के कारण— न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) कमजोर हो सकता है, सार्वजनिक वितरण ...

भारत–अमेरिका व्यापार समझौता : नेताजी सुभाष चंद्र बोस और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों के आलोक में

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भारत–अमेरिका व्यापार समझौता : नेताजी सुभाष चंद्र बोस और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों के आलोक में प्रस्तावना आज भारत–अमेरिका व्यापार समझौतों को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। विदेशी निवेश, निर्यात वृद्धि और आर्थिक विकास जैसे आकर्षक शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है। लेकिन इन चमकदार घोषणाओं के पीछे एक गंभीर सवाल छिपा है — क्या इन समझौतों में भारतीय किसान, श्रमिक और गरीब जनता के हित सुरक्षित हैं? इस प्रश्न का उत्तर हमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों के संदर्भ में खोजने की आवश्यकता है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस : आर्थिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी नेताजी का स्पष्ट मत था — “राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है, जब राष्ट्र आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो।” नेताजी ने केवल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष नहीं किया, बल्कि विदेशी आर्थिक शोषण का भी तीव्र विरोध किया। वे भली-भांति जानते थे कि यदि राजनीतिक आज़ादी के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था विदेशी शक्तियों और कंपनियों के हाथों में चली गई, तो स्वतंत्रता केव...