लोकतंत्र की विफलता या नागरिकों की उदासीनता?

Image
  ✊ श्रमिक क्रांति – गरीबों की आवाज ✊ लोकतंत्र की विफलता या नागरिकों की उदासीनता? "मैं और मेरा परिवार" से "मेरा समाज, मेरा देश" तक... भारत को स्वतंत्र हुए कई दशक बीत चुके हैं। हम स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने पर गर्व करते हैं। चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं, नई योजनाएँ घोषित होती हैं। फिर भी एक प्रश्न बार-बार सामने आता है— आम नागरिकों की अनेक मूलभूत समस्याएँ वर्षों से जस की तस क्यों बनी हुई हैं? इसका उत्तर केवल सरकार, प्रशासन या राजनेताओं में ढूँढना पर्याप्त नहीं है। शायद अब समय आ गया है कि हम स्वयं का भी आत्ममंथन करें। विचार करने योग्य प्रश्न आज समाज का एक बड़ा वर्ग "मैं और मेरा परिवार" की सीमित सोच तक सिमट गया है। जब व्यक्तिगत समस्याएँ हल हो जाती हैं, तब समाज में हो रहे अन्याय, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी और सार्वजनिक समस्या...

देश से गरीबी हटाना संभव है

देश से गरीबी हटाना संभव है

देश से गरीबी हटाना संभव है

देश में गरीबी का कारण न तो बेरोज़गारी है, न ही स्कूल शिक्षा की कमी, न ही प्रतिभा का अभाव और न ही देश में पैसों की कमी। असली कारण है मज़दूरों के श्रम को उचित दाम न देने वाली, दोषपूर्ण और अन्यायपूर्ण अर्थ-वितरण प्रणाली। इसी मूल पर चोट करना आवश्यक है।

सबसे महत्वपूर्ण कदम यह होना चाहिए कि नकद पैसों के सभी आर्थिक लेन-देन पूरी तरह बंद किए जाएँ। ऐसा होने पर हर किसी की आय रेकॉर्ड पर आएगी और छुपाने की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।

आज देश की लगभग 40% संपत्ति केवल 1% लोगों के हाथों में है। कई लोगों के पास भारी मात्रा में बेनामी संपत्ति और भ्रष्टाचार से अर्जित धन है। यदि सभी लेन-देन केवल ऑनलाइन या चेक के माध्यम से होंगे, तो हर नागरिक की आर्थिक गतिविधि सरकार को स्पष्ट रूप से दिखाई देगी।

इसके लिए ‘श्रमिक अधिकार निधि’ नाम से एक स्वतंत्र कर प्रणाली शुरू की जानी चाहिए। इस प्रणाली से एकत्रित धन सीधे ग़रीब मज़दूरों और मेहनतकशों को उनके श्रम का उचित दाम देने के लिए इस्तेमाल होना चाहिए।

इसी रास्ते से देश की गरीबी का मूल नष्ट होगा और सच्ची समानता व सामाजिक न्याय स्थापित होगा।

– श्रमिक क्रांति – ग़रीबों की आवाज़

Comments

Popular posts from this blog

भारत हा लुटारूंचा देश बनत चालला आहे....?

✍️ अखेर अवतरली गंगा; शिवपिंडीवरील रक्ताभिषेक पावन झाला लोकप्रतिनिधींच्या भगीरथ प्रयत्नांना यश

लोकशाहीचे अपयश की नागरिकांची उदासीनता?