लोकतंत्र की विफलता या नागरिकों की उदासीनता?

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  ✊ श्रमिक क्रांति – गरीबों की आवाज ✊ लोकतंत्र की विफलता या नागरिकों की उदासीनता? "मैं और मेरा परिवार" से "मेरा समाज, मेरा देश" तक... भारत को स्वतंत्र हुए कई दशक बीत चुके हैं। हम स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने पर गर्व करते हैं। चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं, नई योजनाएँ घोषित होती हैं। फिर भी एक प्रश्न बार-बार सामने आता है— आम नागरिकों की अनेक मूलभूत समस्याएँ वर्षों से जस की तस क्यों बनी हुई हैं? इसका उत्तर केवल सरकार, प्रशासन या राजनेताओं में ढूँढना पर्याप्त नहीं है। शायद अब समय आ गया है कि हम स्वयं का भी आत्ममंथन करें। विचार करने योग्य प्रश्न आज समाज का एक बड़ा वर्ग "मैं और मेरा परिवार" की सीमित सोच तक सिमट गया है। जब व्यक्तिगत समस्याएँ हल हो जाती हैं, तब समाज में हो रहे अन्याय, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी और सार्वजनिक समस्या...
पहाड़ों की गोद में स्कूल-कॉलेज और पर्यावरण का ह्रास

पहाड़ों की गोद में स्कूल-कॉलेज और पर्यावरण का ह्रास

आज अनेक नेता लोग अपने व्यक्तिगत आर्थिक लाभ के लिए पहाड़ों की गोद और जंगल क्षेत्र में सस्ती जमीन खरीदते हैं और वहाँ निजी स्कूल, कॉलेज तथा व्यावसायिक प्रकल्प खड़े करते हैं। बाहर से देखने पर यह शिक्षा के प्रसार और "प्रगति" का प्रतीक लगता है, लेकिन असली तस्वीर कुछ और ही है।

इस तरह खड़ी की गई निजी शिक्षण संस्थाएँ कोई बहुत बड़ी समाजसेवा या देशसेवा नहीं होतीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थवश अधिक से अधिक संपत्ति जमा करने का साधन होती हैं। शिक्षा के पवित्र कार्य को मुनाफा कमाने का जरिया बनाना समाज के लिए खतरनाक है।

स्कूल या कॉलेज बनाने के लिए पहाड़ की ढलानों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जाती है। पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुँचता है। प्राकृतिक जलस्रोत, नाले, जैवविविधता और वन्यजीवन पर सीधा असर पड़ता है। दीर्घकालीन दृष्टि से देखें तो यह प्रक्रिया पर्यावरणीय असंतुलन पैदा करने वाली है।

शिक्षा संस्थाएँ समाज के लिए आवश्यक हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। परंतु इसके लिए पहाड़ों और जंगलों का बलिदान देना कितना उचित है? शिक्षा का असली उद्देश्य समाज की प्रगति, संस्कार और टिकाऊ विकास करना है। यदि इसी नाम पर पर्यावरण का विनाश हो गया तो उस शिक्षा का लक्ष्य अधूरा रह जाएगा।

इसलिए स्कूल-कॉलेज निर्माण के लिए वैकल्पिक स्थानों का उपयोग करना, पर्यावरणपूरक निर्माण करना और प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन बनाए रखना ही असली प्रगति है। अन्यथा भविष्य में इस "प्रगति" के नाम पर हमें ही दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे। यह ध्यान रखना होगा कि नेताओं की ऐसी निजी शिक्षण संस्थाएँ वास्तव में व्यक्तिगत संपत्ति जुटाने का साधन हैं, समाजहित या देशहित से इनका कोई खास लेना-देना नहीं है।

– श्रमिक क्रांति – गरीबों की आवाज

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