गरीबांच्या ताटावर चर्चा, पण भ्रष्टांच्या तिजोरीवर मौन

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  गरीबांच्या ताटावर चर्चा, पण भ्रष्टांच्या तिजोरीवर मौन आजच्या समाजात एक विचित्र आणि वेदनादायक चित्र दिसते. गरीब माणसाला सरकारकडून काही किलो मोफत धान्य मिळाले, एखादी शिष्यवृत्ती मिळाली किंवा एखादी योजना मिळाली की लगेच काही लोक त्याला “फुकटखाऊ” म्हणू लागतात. पण दुसऱ्या बाजूला जनतेच्या पैशांवर डल्ला मारणारे, लाखो रुपयांचा पगार घेऊनही लाचखोरी करणारे अधिकारी आणि विकासकामांच्या नावाखाली कोट्यवधींचे कमिशन लाटणारे भ्रष्ट पुढारी यांच्याबद्दल मात्र समाजात तितक्याच तीव्रतेने चर्चा होताना दिसत नाही. गरीबांच्या ताटावर चर्चा होते; पण भ्रष्टांच्या तिजोरीवर मात्र मौन पाळले जाते. हीच आपल्या व्यवस्थेची आणि सामाजिक मानसिकतेची सर्वात मोठी शोकांतिका आहे. गरीब मदत घेतो, कारण परिस्थिती त्याला भाग पाडते एखादा शेतकरी दुष्काळामुळे उद्ध्वस्त होतो. एखादा मजूर रोजंदारी नसल्यामुळे उपाशी झोपतो. एखादी विधवा महिला, वृद्ध व्यक्ती किंवा बेरोजगार युवक शासनाच्या योजनेचा आधार घेतो. हे लोक मदत घेतात कारण त्यांच्याकडे पर्याय नसतो. त्यांना मोफत धान्य, शिष्यवृत्ती किंवा अनुदान ही चैनीची...
पहाड़ों की गोद में स्कूल-कॉलेज और पर्यावरण का ह्रास

पहाड़ों की गोद में स्कूल-कॉलेज और पर्यावरण का ह्रास

आज अनेक नेता लोग अपने व्यक्तिगत आर्थिक लाभ के लिए पहाड़ों की गोद और जंगल क्षेत्र में सस्ती जमीन खरीदते हैं और वहाँ निजी स्कूल, कॉलेज तथा व्यावसायिक प्रकल्प खड़े करते हैं। बाहर से देखने पर यह शिक्षा के प्रसार और "प्रगति" का प्रतीक लगता है, लेकिन असली तस्वीर कुछ और ही है।

इस तरह खड़ी की गई निजी शिक्षण संस्थाएँ कोई बहुत बड़ी समाजसेवा या देशसेवा नहीं होतीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थवश अधिक से अधिक संपत्ति जमा करने का साधन होती हैं। शिक्षा के पवित्र कार्य को मुनाफा कमाने का जरिया बनाना समाज के लिए खतरनाक है।

स्कूल या कॉलेज बनाने के लिए पहाड़ की ढलानों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जाती है। पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुँचता है। प्राकृतिक जलस्रोत, नाले, जैवविविधता और वन्यजीवन पर सीधा असर पड़ता है। दीर्घकालीन दृष्टि से देखें तो यह प्रक्रिया पर्यावरणीय असंतुलन पैदा करने वाली है।

शिक्षा संस्थाएँ समाज के लिए आवश्यक हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। परंतु इसके लिए पहाड़ों और जंगलों का बलिदान देना कितना उचित है? शिक्षा का असली उद्देश्य समाज की प्रगति, संस्कार और टिकाऊ विकास करना है। यदि इसी नाम पर पर्यावरण का विनाश हो गया तो उस शिक्षा का लक्ष्य अधूरा रह जाएगा।

इसलिए स्कूल-कॉलेज निर्माण के लिए वैकल्पिक स्थानों का उपयोग करना, पर्यावरणपूरक निर्माण करना और प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन बनाए रखना ही असली प्रगति है। अन्यथा भविष्य में इस "प्रगति" के नाम पर हमें ही दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे। यह ध्यान रखना होगा कि नेताओं की ऐसी निजी शिक्षण संस्थाएँ वास्तव में व्यक्तिगत संपत्ति जुटाने का साधन हैं, समाजहित या देशहित से इनका कोई खास लेना-देना नहीं है।

– श्रमिक क्रांति – गरीबों की आवाज

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