गरीबांच्या ताटावर चर्चा, पण भ्रष्टांच्या तिजोरीवर मौन

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  गरीबांच्या ताटावर चर्चा, पण भ्रष्टांच्या तिजोरीवर मौन आजच्या समाजात एक विचित्र आणि वेदनादायक चित्र दिसते. गरीब माणसाला सरकारकडून काही किलो मोफत धान्य मिळाले, एखादी शिष्यवृत्ती मिळाली किंवा एखादी योजना मिळाली की लगेच काही लोक त्याला “फुकटखाऊ” म्हणू लागतात. पण दुसऱ्या बाजूला जनतेच्या पैशांवर डल्ला मारणारे, लाखो रुपयांचा पगार घेऊनही लाचखोरी करणारे अधिकारी आणि विकासकामांच्या नावाखाली कोट्यवधींचे कमिशन लाटणारे भ्रष्ट पुढारी यांच्याबद्दल मात्र समाजात तितक्याच तीव्रतेने चर्चा होताना दिसत नाही. गरीबांच्या ताटावर चर्चा होते; पण भ्रष्टांच्या तिजोरीवर मात्र मौन पाळले जाते. हीच आपल्या व्यवस्थेची आणि सामाजिक मानसिकतेची सर्वात मोठी शोकांतिका आहे. गरीब मदत घेतो, कारण परिस्थिती त्याला भाग पाडते एखादा शेतकरी दुष्काळामुळे उद्ध्वस्त होतो. एखादा मजूर रोजंदारी नसल्यामुळे उपाशी झोपतो. एखादी विधवा महिला, वृद्ध व्यक्ती किंवा बेरोजगार युवक शासनाच्या योजनेचा आधार घेतो. हे लोक मदत घेतात कारण त्यांच्याकडे पर्याय नसतो. त्यांना मोफत धान्य, शिष्यवृत्ती किंवा अनुदान ही चैनीची...

भारत में अमीरी का मतलब है – बिना पढ़े नकल करके पास होना!

Shramik Kranti – Garibon Ka Aawaz

 

भारत में अमीरी का मतलब है – बिना पढ़े नकल करके पास होना!

भारत में गरीबी और अमीरी: एक सामाजिक चिंतन

हमारे देश में अमीरी का मतलब है बिना पढ़े नकल करके पास होना। बेशक हर नियम के अपवाद होते हैं, इसलिए जो अपवाद हैं उन्हें बुरा नहीं मानना चाहिए।

दुनिया में अमीर बनने का अधिकार केवल उन्हीं को है जो सही और रचनात्मक मार्ग से परिश्रम करते हैं और जिनके परिश्रम का उपयोग देश की प्रगति और मानव कल्याण में होता है। इसी प्रकार, गरीब बने रहने का अधिकार केवल उन्हें है जो आलसी हैं, मेहनत नहीं करते या जो मेहनत करते हुए भी ऐसा काम करते हैं जिससे देश और समाज का नुकसान होता है।

हमारे देश में अनैतिक और भ्रष्ट मार्ग से अमीर बनने वालों की संख्या बहुत अधिक है। इसके मुकाबले ईमानदार और नैतिक मार्ग से अमीर बनने वालों की संख्या बहुत ही कम है। कुछ उदाहरण देखें –

  • भारी वेतन और भत्ते होने के बावजूद अधिकांश जनप्रतिनिधि जैसे कि सरपंच, विधायक, सांसद, मंत्री आदि हर विकास कार्य में कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार करते हैं और अमीर बनते हैं।
  • सरकारी अधिकारी भी बड़े वेतन पाने के बावजूद रिश्वतखोरी करते हैं और अमीर बनते हैं।
  • कई डॉक्टर मरीज का सच्चे मन से इलाज करने के बजाय उससे अधिक से अधिक पैसा कैसे लिया जाए, इसी सोच से इलाज करते हैं, यानी वे भ्रष्ट मार्ग से अमीर बनते हैं।
  • बड़े उद्योगपति ठेका मज़दूरों से बहुत कम वेतन पर काम करवाते हैं और खुद भारी मुनाफा कमाते हैं — यानी गरीब मज़दूरों के शोषण पर आधारित भ्रष्ट अमीरी प्राप्त करते हैं।
  • अधिकांश व्यापारी लोग किसानों से माल सस्ते में खरीदकर और महँगे में बेचकर भ्रष्ट तरीके से अमीर बनते हैं।
  • न्याय-प्रणाली से जुड़े कई पुलिस अधिकारी, तहसीलदार, वकील और अन्य अधिकारी वादी-प्रतिवादी दोनों से अनैतिक रूप से पैसा वसूलते हैं और भ्रष्ट मार्ग से अमीर बनते हैं।
  • कई शिक्षक विद्यालय में सही से पढ़ाने के बजाय अपने निजी ट्यूशन क्लासेस के ज़रिए भ्रष्ट मार्ग से पैसा कमाकर अमीर बनते हैं।

बौद्धिक और शारीरिक श्रम की असमानता

हमारे देश में बौद्धिक काम को बहुत सम्मान मिला है जबकि शारीरिक श्रम को बहुत हीन समझा गया है। बौद्धिक श्रम के नाम पर कई लोग बिना विशेष कार्य किए ही अधिक पैसा कमा लेते हैं।

इसके उलट, जो लोग शारीरिक परिश्रम करते हैं, वे दिन-रात मेहनत करते हुए भी गरीबी में जीते हैं। वास्तव में दुनिया उनके श्रम पर चलती है, फिर भी उन्हें बहुत कम मेहनताना और अपमानजनक व्यवहार मिलता है। यह अमानवीय व्यवस्था हमारे देश में विकसित हुई है — यही गरीबी की जड़ है।


✍️ अरुण रामचंद्र पांगारकर
प्रणेता, श्रमिक क्रांति मिशन: गरिबों की आवाज

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