🚜 A Right of Way Road... or the Sacrifice of Our Future and the Future of Generations to Come?

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🚜 A Right of Way Road... or the Sacrifice of Our Future and the Future of Generations to Come? A Message of Humanity, Dialogue and Constitutional Values "When a road is blocked, an alternative route can be found. But when the roads between hearts are blocked, society itself loses its direction." Disputes over agricultural access roads and rights of way are not new in rural India. What begins as a disagreement over a few feet of land or a pathway often transforms into a struggle driven by ego, revenge, prestige and hostility. ❖ Is the Issue About a Road or About Humanity? When dialogue stops, disputes begin. Disputes lead to accusations. Accusations lead to conflicts. Conflicts eventually result in police complaints, court cases and years of bitterness. In such situations, the real qu...

विषैला भोजन, बढ़ता कैंसर और रासायनिक खेती : यह केवल गलती नहीं, बल्कि अपराध है

Shramik Kranti – Garibon Ka Aawaz 

विषैला भोजन, बढ़ता कैंसर 

और रासायनिक खेती : यह 

केवल गलती नहीं, बल्कि 

अपराध है

आज कैंसर के मामलों में जो तेज़ी से वृद्धि हो रही है, वह केवल संयोग नहीं है और न ही केवल जीवनशैली का परिणाम है। यह लंबे समय से शरीर में जमा होते आ रहे विष का परिणाम है — और आज उस विष का सबसे बड़ा स्रोत हमारा भोजन बन चुका है।

अज्ञान नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया स्वार्थ

आज खेती में यूरिया, रासायनिक खाद, कीटनाशक और खरपतवारनाशक का उपयोग अज्ञानता के कारण नहीं किया जाता।

कितनी मात्रा उपयोग करनी है, छिड़काव का अंतराल क्या होना चाहिए, कटाई से पहले कितने दिन रुकना चाहिए — यह सब जानकारी होने के बावजूद लाभ और बाज़ार की होड़ में अत्यधिक उपयोग किया जाता है।

समाज, राष्ट्र, देशवासी, मानवता — भोजन उत्पादन के समय इन मूल्यों का विचार शायद ही किया जाता है। यह कड़वा सत्य हमें स्वीकार करना होगा।

“चायना सब्ज़ी” : व्यवस्था का भयावह उदाहरण

आज बाज़ार में बड़े पैमाने पर मिलने वाली तथाकथित “चायना सब्ज़ी” इस समस्या का चरम उदाहरण है।

अत्यधिक तेज़ वृद्धि, अस्वाभाविक आकार, प्राकृतिक टिकाऊपन का अभाव और कृत्रिम रूप से उत्पन्न स्वाद — ये इसकी वास्तविक विशेषताएँ नहीं, बल्कि अतिरासायनिक खेती के लक्षण हैं।

यह सब्ज़ी कहाँ और कितनी मात्रा में रसायनों का उपयोग करके उगाई जाती है, इस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं है। जाँच प्रणाली कमज़ोर है, और उपभोक्ता अक्सर केवल कीमत और दिखावट पर भरोसा करता है।

मुद्दा केवल “चायना सब्ज़ी” का नहीं है; असली समस्या उस व्यवस्था की है जो ऐसे उत्पादन को खुली छूट देती है।

उपभोक्ताओं की भी लापरवाह ज़िम्मेदारी

इस परिस्थिति में उपभोक्ता भी पूरी तरह निर्दोष नहीं हैं।

  • दुष्प्रभाव जानकर भी अनदेखी करना
  • केवल स्वाद, रंग और आकर्षण को प्राथमिकता देना
  • “सब खाते हैं” जैसी मानसिकता अपनाना

इस सामूहिक लापरवाही की कीमत आज समाज कैंसर, मधुमेह और हार्मोनल विकारों के रूप में चुका रहा है।

यह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि प्रणालीगत विफलता है

हाँ, यह व्यवस्था की विफलता है।

  • किसान बाज़ार के दबाव में है
  • बाज़ार लाभ की होड़ में है
  • उपभोक्ता आदतों और सुविधा का गुलाम है

इस श्रृंखला को तोड़ने के लिए निर्णायक सरकारी हस्तक्षेप और सख्त कानून आवश्यक हैं।

“आदर्श किसान” पुरस्कार : एक विडंबना

आज “आदर्श किसान” का सम्मान इस आधार पर नहीं दिया जाता कि उसने समाज को कितना सुरक्षित और पौष्टिक भोजन दिया, बल्कि इस आधार पर दिया जाता है कि उसने कितना आर्थिक लाभ कमाया। यह केवल विसंगति नहीं — यह हमारी खाद्य व्यवस्था की शोकांतिका है।

यदि उत्कृष्टता का मापदंड केवल पैसा बन जाएगा, तो विषैली खेती को सामाजिक मान्यता मिलती रहेगी।

रासायनिक खेती पर प्रतिबंध : विकल्प नहीं, आवश्यकता

आधे-अधूरे उपाय अब प्रभावी नहीं रहे हैं।

रासायनिक खेती को चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह समाप्त कर, जैविक और प्राकृतिक खेती को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

  • रासायनिक खाद, कीटनाशक और खरपतवारनाशक को धीरे-धीरे बंद किया जाए
  • जैविक उत्पादों को न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी संरक्षण दिया जाए
  • विषैले भोजन उत्पादन को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए
  • विषमुक्त भोजन को मौलिक मानव अधिकार माना जाए

विषमुक्त भोजन = राष्ट्रीय सुरक्षा

जिस प्रकार हम जल सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा की बात करते हैं, उसी प्रकार विषमुक्त भोजन सुरक्षा को भी राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए।

क्योंकि आज लोग तुरंत नहीं मरते, लेकिन भीतर से धीरे-धीरे समाप्त किए जा रहे हैं।

यह केवल खेती का प्रश्न नहीं है; यह हमारे अस्तित्व का प्रश्न है।


लेखक : अरुण रामचंद्र पांगारकर
प्रणेता — श्रमिक क्रांति – गरीबों का आवाज

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