लोकतंत्र की विफलता या नागरिकों की उदासीनता?

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  ✊ श्रमिक क्रांति – गरीबों की आवाज ✊ लोकतंत्र की विफलता या नागरिकों की उदासीनता? "मैं और मेरा परिवार" से "मेरा समाज, मेरा देश" तक... भारत को स्वतंत्र हुए कई दशक बीत चुके हैं। हम स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने पर गर्व करते हैं। चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं, नई योजनाएँ घोषित होती हैं। फिर भी एक प्रश्न बार-बार सामने आता है— आम नागरिकों की अनेक मूलभूत समस्याएँ वर्षों से जस की तस क्यों बनी हुई हैं? इसका उत्तर केवल सरकार, प्रशासन या राजनेताओं में ढूँढना पर्याप्त नहीं है। शायद अब समय आ गया है कि हम स्वयं का भी आत्ममंथन करें। विचार करने योग्य प्रश्न आज समाज का एक बड़ा वर्ग "मैं और मेरा परिवार" की सीमित सोच तक सिमट गया है। जब व्यक्तिगत समस्याएँ हल हो जाती हैं, तब समाज में हो रहे अन्याय, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी और सार्वजनिक समस्या...

प्रधानमंत्री को खुला पत्र : भारत–अमेरिका व्यापार समझौता और किसानों का भविष्य

Shramik Kranti – Garibon Ka Aawaz प्रधानमंत्री को खुला पत्र: भारत–अमेरिका व्यापार समझौता और किसानों का भविष्य

प्रधानमंत्री को खुला पत्र :
भारत–अमेरिका व्यापार समझौता और किसानों का भविष्य

यह पत्र भारत सरकार के PG पोर्टल पर औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया गया है।
पंजीकरण संख्या : PMOPG/E/2026/0022461


विषय:भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के संदर्भ में किसानों और श्रमिकों के हितों पर चिंता

सेवा में,
माननीय प्रधानमंत्री जी,

सादर प्रणाम।

मैं एक जागरूक भारतीय नागरिक होने के नाते भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के संदर्भ में किसानों, श्रमिकों और गरीब जनता के भविष्य को लेकर अपनी गंभीर चिंता आपके समक्ष रखना चाहता हूँ। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्पष्ट कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक राष्ट्र आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न हो। वहीं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने यह चेतावनी दी थी कि सामाजिक और आर्थिक न्याय के बिना कोई भी लोकतंत्र स्थायी नहीं रह सकता। आज यह आशंका गहराती जा रही है कि भारत–अमेरिका जैसे व्यापार समझौतों के कारण— न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) कमजोर हो सकता है, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) पर दबाव बढ़ सकता है, और भारतीय कृषि, बाजार व मूल्य निर्धारण पर कॉर्पोरेट नियंत्रण बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है। भारत का किसान पहले ही उत्पादन लागत, जल संकट और बाजार अस्थिरता से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में विदेशी सब्सिडी प्राप्त कृषि और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करना छोटे और सीमांत किसानों के लिए अत्यंत कठिन है। मेरा विनम्र अनुरोध है कि— किसी भी व्यापार समझौते में किसानों और श्रमिकों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए, MSP, PDS और स्थानीय कृषि बाजारों की संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, तथा ऐसे निर्णयों में किसानों और श्रमिक संगठनों से व्यापक परामर्श किया जाए। यह पत्र विरोध नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में एक जिम्मेदार नागरिक की चिंता है। आशा है कि आप इस विषय पर गंभीरता से विचार करेंगे।

सादर,

अरुण रामचंद्र पांगारकर

प्रणेता – श्रमिक क्रांति मिशन “गरीबों की आवाज”


लेखक : अरुण रामचंद्र पांगारकर
प्रणेता : श्रमिक क्रांति मिशन – गरीबों की आवाज

यह लेख विरोध का स्वर नहीं, बल्कि संविधान, राष्ट्रहित और किसान हित में उठाई गई एक जागरूक नागरिक की संवेदनशील चिंता है।

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