गरीबांच्या ताटावर चर्चा, पण भ्रष्टांच्या तिजोरीवर मौन

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  गरीबांच्या ताटावर चर्चा, पण भ्रष्टांच्या तिजोरीवर मौन आजच्या समाजात एक विचित्र आणि वेदनादायक चित्र दिसते. गरीब माणसाला सरकारकडून काही किलो मोफत धान्य मिळाले, एखादी शिष्यवृत्ती मिळाली किंवा एखादी योजना मिळाली की लगेच काही लोक त्याला “फुकटखाऊ” म्हणू लागतात. पण दुसऱ्या बाजूला जनतेच्या पैशांवर डल्ला मारणारे, लाखो रुपयांचा पगार घेऊनही लाचखोरी करणारे अधिकारी आणि विकासकामांच्या नावाखाली कोट्यवधींचे कमिशन लाटणारे भ्रष्ट पुढारी यांच्याबद्दल मात्र समाजात तितक्याच तीव्रतेने चर्चा होताना दिसत नाही. गरीबांच्या ताटावर चर्चा होते; पण भ्रष्टांच्या तिजोरीवर मात्र मौन पाळले जाते. हीच आपल्या व्यवस्थेची आणि सामाजिक मानसिकतेची सर्वात मोठी शोकांतिका आहे. गरीब मदत घेतो, कारण परिस्थिती त्याला भाग पाडते एखादा शेतकरी दुष्काळामुळे उद्ध्वस्त होतो. एखादा मजूर रोजंदारी नसल्यामुळे उपाशी झोपतो. एखादी विधवा महिला, वृद्ध व्यक्ती किंवा बेरोजगार युवक शासनाच्या योजनेचा आधार घेतो. हे लोक मदत घेतात कारण त्यांच्याकडे पर्याय नसतो. त्यांना मोफत धान्य, शिष्यवृत्ती किंवा अनुदान ही चैनीची...

प्रधानमंत्री को खुला पत्र : भारत–अमेरिका व्यापार समझौता और किसानों का भविष्य

Shramik Kranti – Garibon Ka Aawaz प्रधानमंत्री को खुला पत्र: भारत–अमेरिका व्यापार समझौता और किसानों का भविष्य

प्रधानमंत्री को खुला पत्र :
भारत–अमेरिका व्यापार समझौता और किसानों का भविष्य

यह पत्र भारत सरकार के PG पोर्टल पर औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया गया है।
पंजीकरण संख्या : PMOPG/E/2026/0022461


विषय:भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के संदर्भ में किसानों और श्रमिकों के हितों पर चिंता

सेवा में,
माननीय प्रधानमंत्री जी,

सादर प्रणाम।

मैं एक जागरूक भारतीय नागरिक होने के नाते भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के संदर्भ में किसानों, श्रमिकों और गरीब जनता के भविष्य को लेकर अपनी गंभीर चिंता आपके समक्ष रखना चाहता हूँ। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्पष्ट कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक राष्ट्र आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न हो। वहीं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने यह चेतावनी दी थी कि सामाजिक और आर्थिक न्याय के बिना कोई भी लोकतंत्र स्थायी नहीं रह सकता। आज यह आशंका गहराती जा रही है कि भारत–अमेरिका जैसे व्यापार समझौतों के कारण— न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) कमजोर हो सकता है, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) पर दबाव बढ़ सकता है, और भारतीय कृषि, बाजार व मूल्य निर्धारण पर कॉर्पोरेट नियंत्रण बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है। भारत का किसान पहले ही उत्पादन लागत, जल संकट और बाजार अस्थिरता से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में विदेशी सब्सिडी प्राप्त कृषि और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करना छोटे और सीमांत किसानों के लिए अत्यंत कठिन है। मेरा विनम्र अनुरोध है कि— किसी भी व्यापार समझौते में किसानों और श्रमिकों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए, MSP, PDS और स्थानीय कृषि बाजारों की संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, तथा ऐसे निर्णयों में किसानों और श्रमिक संगठनों से व्यापक परामर्श किया जाए। यह पत्र विरोध नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में एक जिम्मेदार नागरिक की चिंता है। आशा है कि आप इस विषय पर गंभीरता से विचार करेंगे।

सादर,

अरुण रामचंद्र पांगारकर

प्रणेता – श्रमिक क्रांति मिशन “गरीबों की आवाज”


लेखक : अरुण रामचंद्र पांगारकर
प्रणेता : श्रमिक क्रांति मिशन – गरीबों की आवाज

यह लेख विरोध का स्वर नहीं, बल्कि संविधान, राष्ट्रहित और किसान हित में उठाई गई एक जागरूक नागरिक की संवेदनशील चिंता है।

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