लोकतंत्र की विफलता या नागरिकों की उदासीनता?

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  ✊ श्रमिक क्रांति – गरीबों की आवाज ✊ लोकतंत्र की विफलता या नागरिकों की उदासीनता? "मैं और मेरा परिवार" से "मेरा समाज, मेरा देश" तक... भारत को स्वतंत्र हुए कई दशक बीत चुके हैं। हम स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने पर गर्व करते हैं। चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं, नई योजनाएँ घोषित होती हैं। फिर भी एक प्रश्न बार-बार सामने आता है— आम नागरिकों की अनेक मूलभूत समस्याएँ वर्षों से जस की तस क्यों बनी हुई हैं? इसका उत्तर केवल सरकार, प्रशासन या राजनेताओं में ढूँढना पर्याप्त नहीं है। शायद अब समय आ गया है कि हम स्वयं का भी आत्ममंथन करें। विचार करने योग्य प्रश्न आज समाज का एक बड़ा वर्ग "मैं और मेरा परिवार" की सीमित सोच तक सिमट गया है। जब व्यक्तिगत समस्याएँ हल हो जाती हैं, तब समाज में हो रहे अन्याय, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी और सार्वजनिक समस्या...

भाग ३ – समाधान : आदर्श अर्थ वितरण प्रणाली

भाग ३ – समाधान : आदर्श अर्थ वितरण प्रणाली

(१) आज की समस्या

वर्तमान आर्थिक व्यवस्था में धन और साधन कुछ गिने-चुने अमीरों के पास जमा हो गए हैं। जबकि श्रमिक, किसान और मजदूर के पास मेहनत होते हुए भी उन्हें उचित मेहनताना नहीं मिलता।

(२) आदर्श अर्थ वितरण की आवश्यकता

समाज के प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम अन्न, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य की मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी हों – यही इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य है।

(३) प्रमुख सिद्धांत

  • हर हाथ को काम मिलना चाहिए।
  • हर काम को उचित दाम और सम्मान मिलना चाहिए।
  • उत्पादन का वितरण न्यायपूर्ण होना चाहिए।
  • भ्रष्टाचार, दलाली और फिजूलखर्ची पर नियंत्रण होना चाहिए।

(४) समाज को लाभ

  • श्रमिक वर्ग को आत्मसम्मान और सुरक्षा मिलेगी।
  • उत्पादन क्षमता बढ़ेगी।
  • अमीर-गरीब की खाई कम होगी।
  • सच्चे अर्थों में सामाजिक समानता स्थापित होगी।

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