लोकतंत्र की विफलता या नागरिकों की उदासीनता?

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  ✊ श्रमिक क्रांति – गरीबों की आवाज ✊ लोकतंत्र की विफलता या नागरिकों की उदासीनता? "मैं और मेरा परिवार" से "मेरा समाज, मेरा देश" तक... भारत को स्वतंत्र हुए कई दशक बीत चुके हैं। हम स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने पर गर्व करते हैं। चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं, नई योजनाएँ घोषित होती हैं। फिर भी एक प्रश्न बार-बार सामने आता है— आम नागरिकों की अनेक मूलभूत समस्याएँ वर्षों से जस की तस क्यों बनी हुई हैं? इसका उत्तर केवल सरकार, प्रशासन या राजनेताओं में ढूँढना पर्याप्त नहीं है। शायद अब समय आ गया है कि हम स्वयं का भी आत्ममंथन करें। विचार करने योग्य प्रश्न आज समाज का एक बड़ा वर्ग "मैं और मेरा परिवार" की सीमित सोच तक सिमट गया है। जब व्यक्तिगत समस्याएँ हल हो जाती हैं, तब समाज में हो रहे अन्याय, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी और सार्वजनिक समस्या...
जातिविहीन समाज और पैसाविहीन अर्थव्यवस्था

जातिविहीन समाज और पैसाविहीन अर्थव्यवस्था – समय की मांग

आज के समय में समाज को सबसे ज़्यादा बांटने का काम जातिवाद और आर्थिक विषमता करती है। जब तक जाति और पैसा लोगों के बीच दीवार बने रहेंगे, तब तक सच्चा समान समाज बनना कठिन है। इसलिए हमें जातिविहीन समाज व्यवस्था और पैसाविहीन अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना ही होगा।

गरीबी और आरक्षण की आवश्यकता

आरक्षण की असली ज़रूरत गरीब वर्ग को है। लेकिन जाति आधारित आरक्षण ने कई बार समाज को और अधिक बांटने का काम किया है। अगर आरक्षण का आधार केवल आर्थिक स्थिति हो, तो सभी ज़रूरतमंदों को न्याय मिल सकता है।

जातिगत विवाद

आरक्षण और जातिगत पहचान के कारण समाज में वाद-विवाद और भेदभाव बढ़ा है। यही कारण है कि जन्म प्रमाणपत्र, शैक्षणिक दाखिला, और सरकारी कागज़ात से धर्म और जाति का कॉलम पूरी तरह समाप्त होना चाहिए। यह कदम जातिविहीन समाज की ओर बड़ा परिवर्तन ला सकता है।

पैसाविहीन अर्थव्यवस्था

भ्रष्टाचार और काले धन को खत्म करने के लिए कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देना चाहिए। ऑनलाइन भुगतान, डिजिटल ट्रांज़ैक्शन और चेक प्रणाली को मुख्यधारा बनाना ही पैसाविहीन अर्थव्यवस्था की ओर कदम है। इससे पारदर्शिता और समानता सुनिश्चित होगी।

मूलभूत सेवाएँ सबके लिए

एक न्यायपूर्ण और समान समाज के लिए न्याय, शिक्षा और स्वास्थ्य सभी नागरिकों को पूरी तरह मुफ़्त उपलब्ध होना चाहिए। यही असली लोकतंत्र की पहचान होगी।


✍️ लेखक: अरुण रामचन्द्र पांगारकर
प्रणेता – श्रमिक क्रान्ति – ग़रीबों की आवाज़

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