आरक्षण नको म्हणणाऱ्यांनो आधी जातिव्यवस्था नष्ट करायला तयार आहात का?

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आरक्षण नको म्हणणाऱ्यांनो आधी जातिव्यवस्था नष्ट करायला तयार आहात का? आजकाल सोशल मीडियावर आरक्षणविरोधी अनेक संदेश व्हायरल होत आहेत. पण एक मूलभूत प्रश्न कोणी विचारत नाही — जर आरक्षण एवढं चुकीचं असेल, तर जातिव्यवस्था नष्ट करण्यासाठी आपण तयार आहोत का? आरक्षण ही समस्या नाही, तर ती एका मोठ्या समस्येचा परिणाम आहे — जातिव्यवस्था . शतकानुशतकं काही समाजघटकांना शिक्षण, संधी आणि सन्मानापासून वंचित ठेवण्यात आलं. त्यामुळेच त्यांना समान संधी देण्यासाठी आरक्षणाची व्यवस्था निर्माण करण्यात आली. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांनी स्पष्ट सांगितले होते — “जाति नष्ट केली नाही, तर समानता कधीच येणार नाही.” मग प्रश्न असा आहे — जर आपण खरोखर समानता मानत असू, तर जात अजूनही का जिवंत आहे? लग्न, समाज, राजकारण यात अजूनही जात का ठरते? जातिव्यवस्था नष्ट करण्यासाठी आपण कितपत प्रयत्न करतो? गरीबी जात पाहून येत नाही — हे खरे आहे. पण भारतात अनेक पिढ्यांपासून जातीनुसार अन्याय झाला आहे, हेही तितकेच खरे आहे. म्हणूनच आरक्षण हे केवळ आर्थिक नाही, तर सामाजिक न्यायाचं साधन आहे. आरक्...

कानून आधारित भारतीय न्याय व्यवस्था : क्या यह वास्तव में न्याय देती है?

Shramik Kranti – Garibon Ka Aawaz

 

कानून आधारित भारतीय न्याय व्यवस्था : क्या यह वास्तव में न्याय देती है?


भारतीय न्याय व्यवस्था को लेकर आम नागरिक के मन में एक बुनियादी सवाल बार-बार उठता है — “क्या अदालतों में सचमुच न्याय मिलता है?” यह सवाल भावनात्मक नहीं, बल्कि अनुभव से पैदा हुआ है।

1) क्या भारतीय न्याय व्यवस्था आदर्श है?

भारतीय न्याय व्यवस्था कानूनों पर आधारित है। कागज़ों पर यह लोकतांत्रिक, समानतावादी और मानवाधिकार-प्रधान दिखती है। लेकिन व्यवहार में यह व्यवस्था —

  • सामान्य व्यक्ति के लिए जटिल
  • महंगी और अत्यंत धीमी
  • न्याय से अधिक प्रक्रिया-केंद्रित

हो चुकी है। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि यह व्यवस्था न्याय के लिए नहीं, बल्कि कानून के पालन के लिए काम कर रही है।

2) क्या अदालतों में सत्य की खोज होती है?

आज की अदालतें सत्य की खोज करने वाली संस्था न होकर सबूतों का मूल्यांकन करने वाली संस्था बन गई हैं।

जो सत्य कानूनी सबूतों में आता है वही स्वीकार किया जाता है। गरीब, अशिक्षित या दबाव में रहने वाला व्यक्ति सत्य होने के बावजूद उसे कानूनी भाषा में सिद्ध नहीं कर पाता।

फलस्वरूप कई बार — सत्य हार जाता है और कानूनी तकनीक जीत जाती है।

3) क्या न्याय के लिए वकीलों की अनिवार्यता सही है?

वर्तमान व्यवस्था में वकील के बिना न्याय पाना लगभग असंभव है। कानून की भाषा और प्रक्रिया आम आदमी की समझ से बाहर है।

वकील को न्याय का माध्यम होना चाहिए, लेकिन अनेक बार वह न्याय का व्यवसाय बन जाता है।

क्या न्याय एक मौलिक अधिकार है या खरीदी जाने वाली सेवा?

4) क्या इस व्यवस्था के लिए संविधान भी जिम्मेदार है?

भारतीय संविधान दुनिया के श्रेष्ठ संविधानों में से एक माना जाता है।

भारत रत्न डॉक्टर बाबा साहब अंबेडकर ने सामाजिक न्याय की मजबूत नींव रखी।

 संविधान ने —

  • न्यायालयों को व्यापक अधिकार दिए
  • परंतु न्याय प्रक्रिया को आम जनता के लिए सरल नहीं बनाया
  • न्याय का अधिकार दिया, पर न्याय की गारंटी नहीं

5) क्या पीड़ित की सीधी बात सुनकर न्याय संभव नहीं?

सैद्धांतिक रूप से यह पूरी तरह संभव है — और यही वास्तविक न्याय होना चाहिए।

लेकिन वर्तमान ढांचे में यह लागू नहीं हो पा रहा।

निष्कर्ष

  • न्याय से अधिक कानून को प्राथमिकता
  • सत्य से अधिक तकनीकी औपचारिकता
  • अमीरों के लिए सुविधा, गरीबों के लिए संघर्ष

✊ न्याय दया नहीं, अधिकार है।


✍️ अरुण रामचंद्र पांगारकर,  अग्रणी, श्रमिक क्रांति – गरीबों की आवाज़

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