नमक का हक अदा करने वाला प्रशासन या न्याय से दूर जाती व्यवस्था?

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नमक का हक अदा करने वाला प्रशासन या न्याय से दूर जाती व्यवस्था?

विशेष लेख : छह वर्षों से चल रहे रास्ते के संघर्ष ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर खड़े किए गंभीर सवाल

एक साधारण वहिवाट (आवागमन) मार्ग का विवाद पिछले छह वर्षों में केवल एक रास्ते का प्रश्न नहीं रह गया है। यह प्रशासनिक जवाबदेही, कानून के पालन और आम नागरिकों को न्याय दिलाने की व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन चुका है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि प्रशासन को यह भलीभांति ज्ञात है कि रास्ते में बाधा कौन उत्पन्न कर रहा है, न्यायिक आदेशों के पालन में अड़चन कौन डाल रहा है और विवाद को लंबा कौन खींच रहा है। फिर भी प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं देती।

कानून का भय या केवल समझाइश?

सरकारी कार्य में बाधा डालना कोई मामूली बात नहीं है। ऐसे मामलों में कानून का कठोर पालन होना चाहिए। लेकिन यहाँ स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने के बजाय उसे समझाया जाता है, उससे सहयोग की अपेक्षा की जाती है और बार-बार विनती की जाती है।

प्रशासन स्वयं रास्ता पूरी तरह खुला कराने का दायित्व निभाने के बजाय केवल मौखिक समझाइश देकर अपनी भूमिका पूरी मान लेता है।

जिम्मेदारी प्रशासन की, बोझ पीड़ित किसानों पर

रास्ते में मौजूद कांटेदार झाड़ियाँ और अवरोध हटाने की जिम्मेदारी प्रशासन स्वयं नहीं लेता। इसके बजाय यह दायित्व पीड़ित किसानों पर ही डाल दिया जाता है।

पूरा रास्ता बाधामुक्त करने के बजाय केवल कुछ शाखाएँ काटने की सलाह दी जाती है, जबकि वास्तविक समस्या जड़ से बनी रहती है।

तर्कहीन प्रश्न और वास्तविकता की अनदेखी

जब किसान रास्ते में मौजूद अवरोधों की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं, तब उनसे पूछा जाता है कि उन्हें केवल यही पेड़ क्यों दिखाई देते हैं।

जबकि वास्तविकता यह है कि विवाद अन्य पेड़ों का नहीं, बल्कि उसी रास्ते का है जिसे कानूनी रूप से उपयोग के लिए खुला किया जाना है। इस साधारण तथ्य को समझने के बजाय उसकी अनदेखी की जाती है।

कागज़ों में खुला रास्ता, व्यवहार में बंद

रास्ता खुला बताया जाता है, लेकिन उसकी सीमाएँ स्पष्ट नहीं की जातीं।

रास्ता खुला बताया जाता है, लेकिन अवरोध पूरी तरह हटाए नहीं जाते।

रास्ता स्वीकृत है, लेकिन उसे वास्तव में उपयोग योग्य बनाने का विरोध किया जाता है।

किसानों ने वर्षा ऋतु में जलभराव वाले हिस्से में पत्थर और मुरुम डालने की मांग की ताकि रास्ता सुरक्षित और उपयोगी बन सके। लेकिन ऐसी मांगों को अस्वीकार कर दिया जाता है।

विडंबना यह है कि पूर्व प्रशासन ने जलभराव और संभावित खतरे का हवाला देकर रास्ता अस्वीकार किया था, जबकि अब रास्ता स्वीकृत होने के बाद भी उसे सुरक्षित बनाने के उपायों का विरोध किया जा रहा है।

क्या अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग मापदंड?

जो लोग रास्ते में बाधाएँ उत्पन्न कर रहे हैं, उनसे प्रशासन अत्यंत विनम्रता से बात करता है। वहीं न्याय और अपने अधिकार की मांग करने वाले किसानों को डांटने या चुप कराने का प्रयास किया जाता है।

यह विरोधाभास स्वाभाविक रूप से प्रशासन की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े करता है।

आंदोलन के बाद ही क्यों होती है कार्रवाई?

पिछले छह वर्षों का अनुभव एक स्पष्ट पैटर्न दर्शाता है। आवेदन दिए जाते हैं, पत्र लिखे जाते हैं, अनुस्मारक भेजे जाते हैं, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती।

मगर जब धरना, उपवास या आंदोलन होता है, तभी प्रशासन सक्रिय होता दिखाई देता है।

दुर्भाग्य से उस समय भी कार्रवाई अक्सर अधूरी रहती है और मूल समस्या जस की तस बनी रहती है।

आखिर कानून के पालन में इतनी हिचकिचाहट क्यों?

कानूनी कार्रवाई के स्थान पर बार-बार समझाइश क्यों?

न्यायिक आदेशों का पूर्ण पालन क्यों नहीं होता?

एक साधारण किसान को अपने अधिकारों के लिए बार-बार आंदोलन क्यों करना पड़ता है?

इन प्रश्नों का उत्तर प्रशासन को जनता के सामने देना चाहिए।

जब न्याय मांगने वालों को संघर्ष करना पड़े और बाधा उत्पन्न करने वालों को बार-बार समझाया जाए, तब एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन में उठता है —

क्या यह वास्तव में अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान प्रशासन है, या न्याय से दूर जाती हुई व्यवस्था?


लेखक : अरुण रामचंद्र पांगारकर
प्रणेता : श्रमिक क्रांति – गरीबों की आवाज

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